Sunday, January 3, 2010





नया साल जैसे नयी दुल्हन
आई है सबके आँगन
नए से रूप में सजी धजी
खनकाती अपने कंघन


नए स्वप्न नयी उमंग
लेकर आई है अपने संग
खुशियों के रंग बिखेरती हुयी
रंगने को अपने ही रंग


नए हैं इसके दिन और रात
नयी है इसकी हर एक बात
आँखों में लिए नए सपने
आई करने नयी शुरुआत


पिछले साल से कई बेहतर है यह
सब कुछ बदलने को तत्पर है यह
पर इस बदलाव को रूप देने के लिए
सहजयोगियों पर निर्भर है यह


बांधे हमसे उम्मीदों की डोर
देख रही है हमारी ओर
जानती है की एक सहज ही है
जो ला सकता है सतयुग का दौर


यह सच है न की इसका भ्रम
इसकी उम्मीदों पर खरे उतरेंगे हम
लाने को वाकई में सतयुग का दौर
हर माह करेंगे सार्वजनिक कार्यक्रम


नए उत्साह से सब आगे आयेंगे
बुजुर्ग भी युवा शक्ति बन जायेंगे
हमारे यत्न करने से ही तो
बाकि लोग भी आत्म साक्षात्कार पाएंगे


जब जग में हर कोई सहजी जायेगा बन
तो ख़ुशी से नाचेगी यह दुल्हन
फिर श्री माताजी को करके धन्यवाद
अशिर्वादित कर्देगी सबका जीवन